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mahabharat 1.154.45: "जब भी मेरी आवश्यकता होगी, मैं अपने पूर्वजों की सेवा में उपस्थित हो जाऊंगा।" ऐसा कहकर दानवों में श्रेष्ठ घटोत्कच पाण्डवों की अनुमति लेकर उत्तर दिशा की ओर चला गया।   |   mahabharat अध्याय 1.154: युधिष्ठिरका भीमसेनको हिडिम्बाके वधसे रोकना, हिडिम्बाकी भीमसेनके लिये प्रार्थना, भीमसेन और हिडिम्बाका मिलन तथा घटोत्कचकी उत्पत्ति   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 154: युधिष्ठिरका भीमसेनको हिडिम्बाके वधसे रोकना, हिडिम्बाकी भीमसेनके लिये प्रार्थना, भीमसेन और हिडिम्बाका मिलन तथा घटोत्कचकी उत्पत्ति  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  1.154.45 
कृत्यकाल उपस्थास्ये पितॄनिति घटोत्कच:।
आमन्त्र्य रक्षसां श्रेष्ठ: प्रतस्थे चोत्तरां दिशम्॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
"जब भी मेरी आवश्यकता होगी, मैं अपने पूर्वजों की सेवा में उपस्थित हो जाऊंगा।" ऐसा कहकर दानवों में श्रेष्ठ घटोत्कच पाण्डवों की अनुमति लेकर उत्तर दिशा की ओर चला गया।
 
"Whenever I am needed, I shall present myself in the service of my forefathers." Having said this, the best of the demons Ghatotkacha took the Pandavas' permission and departed towards the north.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)