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mahabharat 1.154.4: वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! तत्पश्चात हिडिम्बा ने हाथ जोड़कर कुन्तीदेवी और उनके पुत्र युधिष्ठिर को प्रणाम करके इस प्रकार कहा - 4॥   |   mahabharat अध्याय 1.154: युधिष्ठिरका भीमसेनको हिडिम्बाके वधसे रोकना, हिडिम्बाकी भीमसेनके लिये प्रार्थना, भीमसेन और हिडिम्बाका मिलन तथा घटोत्कचकी उत्पत्ति   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 154: युधिष्ठिरका भीमसेनको हिडिम्बाके वधसे रोकना, हिडिम्बाकी भीमसेनके लिये प्रार्थना, भीमसेन और हिडिम्बाका मिलन तथा घटोत्कचकी उत्पत्ति  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  1.154.4 
वैशम्पायन उवाच
हिडिम्बा तु तत: कुन्तीमभिवाद्य कृताञ्जलि:।
युधिष्ठिरं तु कौन्तेयमिदं वचनमब्रवीत्॥ ४॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! तत्पश्चात हिडिम्बा ने हाथ जोड़कर कुन्तीदेवी और उनके पुत्र युधिष्ठिर को प्रणाम करके इस प्रकार कहा - 4॥
 
Vaishampayanji says – Janamejaya! Thereafter, Hidimba, with folded hands, bowed to Kuntidevi and her son Yudhishthir and said thus - 4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)