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mahabharat 1.154.22-30: वह अत्यंत सुंदर रूप धारण करके, सब प्रकार के आभूषणों से विभूषित होकर, सुन्दर पर्वत शिखरों पर, देवताओं के धामों में तथा ऐसे मनोरम प्रदेशों में, जहाँ अनेक पशु-पक्षी मधुर वाणी बोलते रहते हैं, सदैव निवास करके पाण्डु नन्दन भीमसेन को सुख पहुँचाती थी। इसी प्रकार पुष्पयुक्त वृक्षों और लताओं से सुशोभित दुर्गम वनों में, कमल और कुमुदिनी आदि पुष्पों से सुशोभित सुन्दर सरोवरों में, नदियों के द्वीपों में तथा जहाँ की बालू वैदूर्य-मणि के समान है, जिनके घाट, तट पर वन और जल सब सुन्दर और पवित्र हैं, उन पर्वतीय नदियों में, परिपक्व वृक्षों और लताओं से सुशोभित विचित्र वनों में, हिमालय पर्वत की कुंजों और नाना प्रकार की गुफाओं में, खिले हुए कमल पुष्पों से युक्त निर्मल जल वाले सरोवरों में, रत्नों और सुवर्ण से युक्त तटवर्ती प्रदेशों में, छोटे-छोटे सुन्दर तालाबों में, बड़े-बड़े साल वृक्षों वाले वनों में, देवताओं के पवित्र वनों में, पर्वत शिखरों पर, गुह्यकों के निवासों में, सभी ऋतुओं के फलों से युक्त तपस्वी मुनियों के सुन्दर आश्रमों में, तथा मानसरोवर आदि जलाशयों में अत्यन्त सुन्दर रूप धारण करके हिडिम्बा पाण्डवपुत्र के पास गयी। उसने भीमसेन के साथ आनन्दपूर्वक समय बिताया। वह मन के समान तीव्र गति से चलने लगी और इस प्रकार भीमसेन को आनन्द प्रदान करती हुई समस्त स्थानों में विचरण करने लगी।   |   mahabharat अध्याय 1.154: युधिष्ठिरका भीमसेनको हिडिम्बाके वधसे रोकना, हिडिम्बाकी भीमसेनके लिये प्रार्थना, भीमसेन और हिडिम्बाका मिलन तथा घटोत्कचकी उत्पत्ति   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 154: युधिष्ठिरका भीमसेनको हिडिम्बाके वधसे रोकना, हिडिम्बाकी भीमसेनके लिये प्रार्थना, भीमसेन और हिडिम्बाका मिलन तथा घटोत्कचकी उत्पत्ति  »  श्लोक 22-30
 
 
श्लोक  1.154.22-30 
शैलशृङ्गेषु रम्येषु देवतायतनेषु च।
मृगपक्षिविघुष्टेषु रमणीयेषु सर्वदा॥ २२॥
कृत्वा च परमं रूपं सर्वाभरणभूषिता।
संजल्पन्ती सुमधुरं रमयामास पाण्डवम्॥ २३॥
तथैव वनदुर्गेषु पुष्पितद्रुमवल्लिषु।
सरस्सु रमणीयेषु पद्मोत्पलयुतेषु च॥ २४॥
नदीद्वीपप्रदेशेषु वैदूर्यसिकतासु च।
सुतीर्थवनतोयासु तथा गिरिनदीषु च॥ २५॥
काननेषु विचित्रेषु पुष्पितद्रुमवल्लिषु।
हिमवद्‍‍गिरिकुञ्जेषु गुहासु विविधासु च॥ २६॥
प्रफुल्लशतपत्रेषु सरस्स्वमलवारिषु।
सागरस्य प्रदेशेषु मणिहेमचितेषु च॥ २७॥
पल्वलेषु च रम्येषु महाशालवनेषु च।
देवारण्येषु पुण्येषु तथा पर्वतसानुषु॥ २८॥
गुह्यकानां निवासेषु तापसायतनेषु च।
सर्वर्तुफलरम्येषु मानसेषु सरस्सु च॥ २९॥
बिभ्रती परमं रूपं रमयामास पाण्डवम्।
रमयन्ती तथा भीमं तत्र तत्र मनोजवा॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
वह अत्यंत सुंदर रूप धारण करके, सब प्रकार के आभूषणों से विभूषित होकर, सुन्दर पर्वत शिखरों पर, देवताओं के धामों में तथा ऐसे मनोरम प्रदेशों में, जहाँ अनेक पशु-पक्षी मधुर वाणी बोलते रहते हैं, सदैव निवास करके पाण्डु नन्दन भीमसेन को सुख पहुँचाती थी। इसी प्रकार पुष्पयुक्त वृक्षों और लताओं से सुशोभित दुर्गम वनों में, कमल और कुमुदिनी आदि पुष्पों से सुशोभित सुन्दर सरोवरों में, नदियों के द्वीपों में तथा जहाँ की बालू वैदूर्य-मणि के समान है, जिनके घाट, तट पर वन और जल सब सुन्दर और पवित्र हैं, उन पर्वतीय नदियों में, परिपक्व वृक्षों और लताओं से सुशोभित विचित्र वनों में, हिमालय पर्वत की कुंजों और नाना प्रकार की गुफाओं में, खिले हुए कमल पुष्पों से युक्त निर्मल जल वाले सरोवरों में, रत्नों और सुवर्ण से युक्त तटवर्ती प्रदेशों में, छोटे-छोटे सुन्दर तालाबों में, बड़े-बड़े साल वृक्षों वाले वनों में, देवताओं के पवित्र वनों में, पर्वत शिखरों पर, गुह्यकों के निवासों में, सभी ऋतुओं के फलों से युक्त तपस्वी मुनियों के सुन्दर आश्रमों में, तथा मानसरोवर आदि जलाशयों में अत्यन्त सुन्दर रूप धारण करके हिडिम्बा पाण्डवपुत्र के पास गयी। उसने भीमसेन के साथ आनन्दपूर्वक समय बिताया। वह मन के समान तीव्र गति से चलने लगी और इस प्रकार भीमसेन को आनन्द प्रदान करती हुई समस्त स्थानों में विचरण करने लगी।
 
She brought happiness to Pandu Nandan Bhimsen by always assuming a very beautiful form, adorned with all kinds of ornaments, on the beautiful mountain peaks, in the abodes of the gods and in such picturesque regions where many animals and birds keep making sweet words. Similarly, roaming around in inaccessible forests decorated with flowering trees and creepers, in beautiful lakes decorated with lotus and lily etc., in the islands of the rivers and where the sand is like vaidurya-gem, whose ghats, forests on the banks and water are all beautiful and sacred, in those mountain rivers, in the strange forests decorated with mature trees and creepers, in the bowers and various caves of the Himalayan mountains, in the lakes with clear water filled with blooming lotus flowers, in the coastal regions rich in gems and gold, in small beautiful ponds, in the forests of big sal trees, in the sacred forests of gods, on the mountain peaks, in the abodes of the Guhyakas, in the beautiful ashrams of ascetic sages rich in fruits of all seasons, and in Manasarovar and other water bodies, Hidimba, assuming a very beautiful form, went to the Pandava son. She enjoyed the company of Bhimasena. She moved as fast as the mind and thus kept roaming in all the places giving pleasure to Bhimasena.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)