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mahabharat 1.154.15: 'पुण्य ही जीवन को धारण करता है, इसलिए पुण्य को जीवनदाता कहा गया है; इसलिए धर्म का आचरण करने के लिए जो भी उपाय करना चाहिए, उसमें कुछ भी निन्दनीय नहीं है।॥15॥   |   mahabharat अध्याय 1.154: युधिष्ठिरका भीमसेनको हिडिम्बाके वधसे रोकना, हिडिम्बाकी भीमसेनके लिये प्रार्थना, भीमसेन और हिडिम्बाका मिलन तथा घटोत्कचकी उत्पत्ति   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 154: युधिष्ठिरका भीमसेनको हिडिम्बाके वधसे रोकना, हिडिम्बाकी भीमसेनके लिये प्रार्थना, भीमसेन और हिडिम्बाका मिलन तथा घटोत्कचकी उत्पत्ति  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  1.154.15 
पुण्यं प्राणान् धारयति पुण्यं प्राणदमुच्यते।
येन येनाचरेद् धर्मं तस्मिन् गर्हा न विद्यते॥ १५॥
 
 
अनुवाद
'पुण्य ही जीवन को धारण करता है, इसलिए पुण्य को जीवनदाता कहा गया है; इसलिए धर्म का आचरण करने के लिए जो भी उपाय करना चाहिए, उसमें कुछ भी निन्दनीय नहीं है।॥15॥
 
'It is virtue that sustains life, and therefore virtue is called the life-giver; therefore, there is nothing reprehensible in doing any method that enables one to practice Dharma.॥ 15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)