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mahabharat 1.151.d1-30: वीर! मैं तुम्हारा कल्याण चाहता हूँ। हो सकता है कि तुम्हारे त्याग के कारण मेरे प्राण ही चले जाएँ। हे शत्रुनाशक! यदि तुम मुझे त्याग दोगे, तो मैं कभी जीवित नहीं रह सकूँगा। मैं आकाश में विचरण करता हूँ। जहाँ चाहूँ वहाँ विचरण कर सकता हूँ। तुम मेरे साथ विभिन्न लोकों और लोकों में विचरण करो और अद्वितीय सुख प्राप्त करो।॥30॥   |   mahabharat अध्याय 1.151: हिडिम्बके भेजनेसे हिडिम्बा राक्षसीका पाण्डवोंके पास आना और भीमसेनसे उसका वार्तालाप   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  1.151.d1-30 
(इच्छामि वीर भद्रं ते मा मा प्राणा विहासिषु:।
त्वया ह्यहं परित्यक्ता न जीवेयमरिंदम॥ )
अन्तरिक्षचरी ह्यस्मि कामतो विचरामि च।
अतुलामाप्नुहि प्रीतिं तत्र तत्र मया सह॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
वीर! मैं तुम्हारा कल्याण चाहता हूँ। हो सकता है कि तुम्हारे त्याग के कारण मेरे प्राण ही चले जाएँ। हे शत्रुनाशक! यदि तुम मुझे त्याग दोगे, तो मैं कभी जीवित नहीं रह सकूँगा। मैं आकाश में विचरण करता हूँ। जहाँ चाहूँ वहाँ विचरण कर सकता हूँ। तुम मेरे साथ विभिन्न लोकों और लोकों में विचरण करो और अद्वितीय सुख प्राप्त करो।॥30॥
 
‘Veer! I wish for your well being. It may happen that my life leaves me because of your rejection. O enemy-destroyer! If you abandon me, I will never be able to survive. I roam in the sky. I can roam wherever I wish. You should roam with me in different worlds and regions and get unique happiness.’॥ 30॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)