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श्लोक 1.151.36  |
गच्छ वा तिष्ठ वा भद्रे यद् वापीच्छसि तत् कुरु।
तं वा प्रेषय तन्वङ्गि भ्रातरं पुरुषादकम्॥ ३६॥ |
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| अनुवाद |
| अतः हे महापुरुष, तुम जाओ या रहो; अथवा जो चाहो करो। हे तन्वंगी, अथवा यदि तुम चाहो तो अपने नरभक्षी भाई को भेज दो। |
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| Therefore, O noble one, you may go or stay; or do as you please. O Tanvangi, or if you wish, send your cannibal brother. |
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इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि हिडिम्बवधपर्वणि भीमहिडिम्बासंवादे एकपञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:॥ १५१॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अर्न्तगत हिडिम्बवधपर्वमें भीम-हिडिम्बा-संवादविषयक एक सौ इक्यावनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १५१॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल ३८ श्लोक हैं) |
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