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श्लोक 1.151.10  |
आक्रम्य मानुषं कण्ठमाच्छिद्य धमनीमपि।
उष्णं नवं प्रपास्यामि फेनिलं रुधिरं बहु॥ १०॥ |
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| अनुवाद |
| 'मैं उस आदमी की गर्दन पर चढ़ जाऊँगा और उसकी नसें काट डालूँगा और उसका गरम, झागदार और ताज़ा खून जी भरकर पी जाऊँगा।॥10॥ |
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| 'I will climb upon the man's neck and cut his veins and drink his hot, foamy and fresh blood to my heart's content.॥ 10॥ |
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