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mahabharat 1.150.22: हाय! मैं कितना अभागा हूँ कि आज अपने भाइयों को पृथ्वी पर सोते हुए देख रहा हूँ। इससे बढ़कर दुःख और क्या हो सकता है?॥ 22॥   |   mahabharat अध्याय 1.150: माता कुन्तीके लिये भीमसेनका जल ले आना, माता और भाइयोंको भूमिपर सोये देखकर भीमका विषाद एवं दुर्योधनके प्रति क्रोध   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 150: माता कुन्तीके लिये भीमसेनका जल ले आना, माता और भाइयोंको भूमिपर सोये देखकर भीमका विषाद एवं दुर्योधनके प्रति क्रोध  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  1.150.22 
अत: कष्टतरं किं नु द्रष्टव्यं हि भविष्यति।
यत् पश्यामि महीसुप्तान् भ्रातॄनद्य सुमन्दभाक्॥ २२॥
 
 
अनुवाद
हाय! मैं कितना अभागा हूँ कि आज अपने भाइयों को पृथ्वी पर सोते हुए देख रहा हूँ। इससे बढ़कर दुःख और क्या हो सकता है?॥ 22॥
 
'Alas! How unfortunate I am that today I am seeing my brothers sleeping on the earth. What could be more painful than this?॥ 22॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)