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mahabharat 1.15.2-3: उसी शाप की शांति के लिए नागप्रवर वसु ने अपनी बहन का विवाह सदाचारी महात्मा जरत्कारु से कर दिया था। महामना जरत्कारु ने शास्त्रीय विधि से उस नागकन्या से विवाह किया और उसके गर्भ से आस्तिक नामक पुत्र को जन्म दिया। 2-3॥   |   mahabharat अध्याय 1.15: आस्तीकका जन्म तथा मातृशापसे सर्पसत्रमें नष्ट होनेवाले नागवंशकी उनके द्वारा रक्षा   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 15: आस्तीकका जन्म तथा मातृशापसे सर्पसत्रमें नष्ट होनेवाले नागवंशकी उनके द्वारा रक्षा  »  श्लोक 2-3
 
 
श्लोक  1.15.2-3 
तस्य शापस्य शान्त्यर्थं प्रददौ पन्नगोत्तम:।
स्वसारमृषये तस्मै सुव्रताय महात्मने॥ २॥
स च तां प्रतिजग्राह विधिदृष्टेन कर्मणा।
आस्तीको नाम पुत्रश्च तस्यां जज्ञे महामना:॥ ३॥
 
 
अनुवाद
उसी शाप की शांति के लिए नागप्रवर वसु ने अपनी बहन का विवाह सदाचारी महात्मा जरत्कारु से कर दिया था। महामना जरत्कारु ने शास्त्रीय विधि से उस नागकन्या से विवाह किया और उसके गर्भ से आस्तिक नामक पुत्र को जन्म दिया। 2-3॥
 
To appease the same curse, Nagpravar Vasu had given his sister in marriage to Mahatma Jaratkaru, who followed good conduct. Mahamana Jaratkaru married that snake girl according to the classical method and gave birth to a son named Aastik from her womb. 2-3॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)