श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 149: धृतराष्ट्र आदिके द्वारा पाण्डवोंके लिये शोकप्रकाश एवं जलांजलिदान तथा पाण्डवोंका वनमें प्रवेश  »  श्लोक d18-d20
 
 
श्लोक  1.149.d18-d20 
वैशम्पायन उवाच
तस्य विक्रन्दितं श्रुत्वा उदकं च प्रसिञ्चत:।
देशकालं समाज्ञाय विदुर: प्रत्यभाषत॥
मा शोचीस्त्वं नरव्याघ्र जहि शोकं महाव्रत।
न तेषां विद्यते पापं प्राप्तकालं कृतं मया।
एतच्च तेभ्य उदकं विप्रसिञ्च न भारत॥
सोऽब्रवीत् किंचिदुत्सार्य कौरवाणामशृण्वताम्।
क्षत्तारमुपसंगृह्य बाष्पोत्पीडकलस्वर:॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायन कहते हैं - जलांजलि देते समय भीष्म का यह विलाप सुनकर विदुर जी ने समय और स्थान का भली-भाँति विचार करके कहा - 'पुरुषश्रेष्ठ! आप शोक न करें। महाव्रती शूरवीर! आप शोक त्याग दें, पाण्डवों की मृत्यु नहीं हुई है। उस अवसर पर मैंने जो उचित किया, वही किया है। भरत! आप उन पाण्डवों के लिए जलांजलि न दें।' तब भीष्म जी विदुर का हाथ पकड़कर उन्हें वहाँ से दूर ले गए, जहाँ कौरव उन्हें सुन न सकें। फिर वे आँसू बहाते हुए रुँधे हुए स्वर में बोले।
 
Vaishampayana says - Hearing this lamentation of Bhishma while offering Jalanjali, Vidur ji thought about the time and place very well and said - 'Best of men! Do not be sad. Great vrati valiant! You should give up mourning, the Pandavas have not died. I have done what was right on that occasion. Bhaarat! Do not offer Jalanjali for those Pandavas.' Then Bhishma ji took Vidur's hand and took him away from there, where the Kauravas could not hear him. Then he spoke in a choked voice while shedding tears.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)