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mahabharat 1.148.12: 'विदुर जी ने भक्तिपूर्वक आप सब पाण्डुपुत्रों को गले लगाकर और उनके माथे को सूंघकर पुनः यह वर दिया है कि 'आप शान्त रहें और सुरक्षित रूप से मार्ग पर आगे बढ़ते रहें।'॥12॥   |   mahabharat अध्याय 1.148: विदुरजीके भेजे हुए नाविकका पाण्डवोंको गंगाजीके पार उतारना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 148: विदुरजीके भेजे हुए नाविकका पाण्डवोंको गंगाजीके पार उतारना  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  1.148.12 
विदुरो मूर्ध्न्युपाघ्राय परिष्वज्य वचो मुहु:।
अरिष्टं गच्छताव्यग्रा: पन्थानमिति चाब्रवीत्॥ १२॥
 
 
अनुवाद
'विदुर जी ने भक्तिपूर्वक आप सब पाण्डुपुत्रों को गले लगाकर और उनके माथे को सूंघकर पुनः यह वर दिया है कि 'आप शान्त रहें और सुरक्षित रूप से मार्ग पर आगे बढ़ते रहें।'॥12॥
 
'Vidur ji, having embraced all you sons of Pandu with devotion and smelling their foreheads, has again given this blessing that 'May you be calm and continue to proceed on the path safely.'॥ 12॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)