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श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 147: लाक्षागृहका दाह और पाण्डवोंका सुरंगके रास्ते निकल जाना  »  श्लोक 20-21
 
 
श्लोक  1.147.20-21 
भीमसेनस्तु राजेन्द्र भीमवेगपराक्रम:।
जगाम भ्रातॄनादाय सर्वान् मातरमेव च॥ २०॥
स्कन्धमारोप्य जननीं यमावङ्केन वीर्यवान्।
पार्थौ गृहीत्वा पाणिभ्यां भ्रातरौ सुमहाबल:॥ २१॥
 
 
अनुवाद
राजन! भीमसेन, जो अत्यंत तेज और पराक्रमी थे, अपने सभी भाइयों और माता के साथ चल रहे थे। वे महान बल और पराक्रम से संपन्न थे। उन्होंने अपनी माता को कंधे पर बिठा लिया और नकुल-सहदेव को गोद में लेकर अन्य दोनों भाइयों को दोनों हाथों से पकड़कर आगे बढ़ने लगे।
 
King! Bhimasena, who was extremely fast and valiant, was walking along with all his brothers and mother. He was endowed with great strength and valour. He took his mother on his shoulders and took Nakul-Sahadeva in his lap and started walking while supporting the other two brothers by holding them in both his hands.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)