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mahabharat 1.145.5: निष्पाप जनमेजय! नगरवासियों ने बड़े आदरपूर्वक पाण्डवों का स्वागत किया। फिर पाण्डव भी नगरवासियों का आदरपूर्वक स्वागत करके, जनसमुदाय से पूर्ण सुसज्जित वारणावत नगर में प्रवेश कर गए॥5॥   |   mahabharat अध्याय 1.145: वारणावतमें पाण्डवोंका स्वागत, पुरोचनका सत्कारपूर्वक उन्हें ठहराना, लाक्षागृहमें निवासकी व्यवस्था और युधिष्ठिर एवं भीमसेनकी बातचीत   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 145: वारणावतमें पाण्डवोंका स्वागत, पुरोचनका सत्कारपूर्वक उन्हें ठहराना, लाक्षागृहमें निवासकी व्यवस्था और युधिष्ठिर एवं भीमसेनकी बातचीत  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  1.145.5 
सत्कृताश्चैव पौरैस्ते पौरान् सत्कृत्य चानघ।
अलंकृतं जनाकीर्णं विविशुर्वारणावतम्॥ ५॥
 
 
अनुवाद
निष्पाप जनमेजय! नगरवासियों ने बड़े आदरपूर्वक पाण्डवों का स्वागत किया। फिर पाण्डव भी नगरवासियों का आदरपूर्वक स्वागत करके, जनसमुदाय से पूर्ण सुसज्जित वारणावत नगर में प्रवेश कर गए॥5॥
 
Sinless Janamejaya! The people of the city welcomed the Pandavas with great respect. Then the Pandavas too, after respectfully accepting the citizens, entered the decorated city of Varanavat which was full of people. ॥ 5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)