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mahabharat 1.145.4: उनसे घिरे हुए देवताओं के समान तेजस्वी पुरुषसिंह धर्मराज युधिष्ठिर ऐसे शोभायमान हो रहे थे मानो देवताओं की सभा में साक्षात वज्रधारी इन्द्र हों॥4॥   |   mahabharat अध्याय 1.145: वारणावतमें पाण्डवोंका स्वागत, पुरोचनका सत्कारपूर्वक उन्हें ठहराना, लाक्षागृहमें निवासकी व्यवस्था और युधिष्ठिर एवं भीमसेनकी बातचीत   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 145: वारणावतमें पाण्डवोंका स्वागत, पुरोचनका सत्कारपूर्वक उन्हें ठहराना, लाक्षागृहमें निवासकी व्यवस्था और युधिष्ठिर एवं भीमसेनकी बातचीत  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  1.145.4 
तैर्वृत: पुरुषव्याघ्रो धर्मराजो युधिष्ठिर:।
विबभौ देवसंकाशो वज्रपाणिरिवामरै:॥ ४॥
 
 
अनुवाद
उनसे घिरे हुए देवताओं के समान तेजस्वी पुरुषसिंह धर्मराज युधिष्ठिर ऐसे शोभायमान हो रहे थे मानो देवताओं की सभा में साक्षात वज्रधारी इन्द्र हों॥4॥
 
Surrounded by them, the Purusha Singh Dharmaraja Yudhishthir, who was as bright as the gods, was looking as graceful as if he were the thunderbolt Indra in person amidst the gathering of gods. 4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)