श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 145: वारणावतमें पाण्डवोंका स्वागत, पुरोचनका सत्कारपूर्वक उन्हें ठहराना, लाक्षागृहमें निवासकी व्यवस्था और युधिष्ठिर एवं भीमसेनकी बातचीत  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  1.145.31 
वसतोऽत्र यथा चास्मान्न बुध्येत पुरोचन:।
पौरो वापि जन: कश्चित् तथा कार्यमतन्द्रितै:॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
हमें आलस्य त्यागकर इस प्रकार काम करना चाहिए कि यहाँ रहते हुए पुरोचन को हमारे विषय में कुछ भी पता न चले और नगर के किसी निवासी को भी हमारे विषय में कुछ समाचार न मिले ॥31॥
 
We must give up our laziness and work in such a way that while living here, Purochana does not come to know anything about us and no resident of the city gets any news about us. ॥ 31॥
 
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि जतुगृहपर्वणि भीमसेनयुधिष्ठिरसंवादे पञ्चचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:॥ १४५॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत जतुगृहपर्वमें भीमसेन-युधिष्ठिर-संवादविषयक एक सौ पैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १४५॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)