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mahabharat 1.145.14: हे शत्रुओं को पीड़ा देने वाले भीमसेन! मुझे इस घर की दीवारों से लाख मिले हुए घी और चर्बी की गंध आ रही है। अतः यह स्पष्ट है कि यह घर अग्नि प्रज्वलित करने वाली सामग्री से निर्मित है॥ 14॥   |   mahabharat अध्याय 1.145: वारणावतमें पाण्डवोंका स्वागत, पुरोचनका सत्कारपूर्वक उन्हें ठहराना, लाक्षागृहमें निवासकी व्यवस्था और युधिष्ठिर एवं भीमसेनकी बातचीत   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 145: वारणावतमें पाण्डवोंका स्वागत, पुरोचनका सत्कारपूर्वक उन्हें ठहराना, लाक्षागृहमें निवासकी व्यवस्था और युधिष्ठिर एवं भीमसेनकी बातचीत  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  1.145.14 
जिघ्राणोऽस्य वसागन्धं सर्पिर्जतुविमिश्रितम्।
कृतं हि व्यक्तमाग्नेयमिदं वेश्म परंतप॥ १४॥
 
 
अनुवाद
हे शत्रुओं को पीड़ा देने वाले भीमसेन! मुझे इस घर की दीवारों से लाख मिले हुए घी और चर्बी की गंध आ रही है। अतः यह स्पष्ट है कि यह घर अग्नि प्रज्वलित करने वाली सामग्री से निर्मित है॥ 14॥
 
'O Bhimasena, who torments the enemies! I can smell the smell of ghee and fat mixed with lacquer from the walls of this house. Therefore, it is clear that this house has been constructed from materials that can light fire.॥ 14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)