| श्री महाभारत » पर्व 1: आदि पर्व » अध्याय 143: दुर्योधनके आदेशसे पुरोचनका वारणावत नगरमें लाक्षागृह बनाना » श्लोक 14-15 |
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| | | | श्लोक 1.143.14-15  | आसनानि च दिव्यानि यानानि शयनानि च।
विधातव्यानि पाण्डूनां यथा तुष्येत वै पिता॥ १४॥
यथा च तन्न जानन्ति नगरे वारणावते।
तथा सर्वं विधातव्यं यावत् कालस्य पर्यय:॥ १५॥ | | | | | | अनुवाद | | 'वहाँ पाण्डवों के लिए दिव्य आसन, सवारी और शय्या आदि ऐसी (सुन्दर) व्यवस्था करो कि सुनकर मेरे पिता प्रसन्न हो जाएँ। जब तक समय के परिवर्तन से अभीष्ट कार्य सिद्ध न हो जाए, तब तक सब कार्य इस प्रकार करो कि वारणावत नगर के लोगों को इसका कुछ भी पता न चले।॥14-15॥ | | | | 'Make such (beautiful) arrangements for the Pandavas there, like divine seats, rides and beds etc., that my father will be pleased on hearing it. Until the desired task is accomplished with the change of time, all work should be done in such a way that the people of the city of Varanavat should not come to know anything about it.॥ 14-15॥ | | ✨ ai-generated | | |
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