वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तेषु राज्ञा तु पाण्डुपुत्रेषु भारत।
दुर्योधन: परं हर्षमगच्छत् स दुरात्मवान्॥ १॥
स पुरोचनमेकान्तमानीय भरतर्षभ।
गृहीत्वा दक्षिणे पाणौ सचिवं वाक्यमब्रवीत्॥ २॥
ममेयं वसुसम्पूर्णा पुरोचन वसुंधरा।
यथेयं मम तद्वत् ते स तां रक्षितुमर्हसि॥ ३॥
न हि मे कश्चिदन्योऽस्ति विश्वासिकतरस्त्वया।
सहायो येन संधाय मन्त्रयेयं यथा त्वया॥ ४॥
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! जब राजा धृतराष्ट्र ने पाण्डवों को इस प्रकार वारणावत जाने की आज्ञा दी, तब दुष्टबुद्धि दुर्योधन को बड़ी प्रसन्नता हुई। हे भरतश्रेष्ठ! उसने अपने मंत्री पुरोचन को एकान्त में बुलाया और उसका दाहिना हाथ पकड़कर कहा - 'पुरोचन! धन-धान्य से परिपूर्ण यह पृथ्वी मेरी भी है और तुम्हारी भी; अतः तुम इसकी रक्षा करो। तुमसे बढ़कर मेरा कोई दूसरा ऐसा विश्वासपात्र सहायक नहीं है, जिससे मैं मिलकर ऐसी गुप्त सलाह कर सकूँ, जैसी मैं तुमसे करता हूँ।॥ 1-4॥
Vaishampayana says - Janamejaya! When King Dhritarashtra ordered the Pandavas to go to Varnavata in this manner, the evil-minded Duryodhan was very happy. O best of the Bharatas! He called his minister Purochana in private and holding his right hand said, 'Purochan! This earth full of wealth and grains is yours as well as mine; therefore you should protect it. I do not have any other such trustworthy assistant better than you, with whom I can meet and take such secret advice, as I do with you.॥ 1-4॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥