एवमुक्तास्तु ते सर्वे पाण्डुपुत्रेण कौरवा:।
प्रसन्नवदना भूत्वा तेऽन्ववर्तन्त पाण्डवान्॥ १७॥
स्वस्त्यस्तु व: पथि सदा भूतेभ्यश्चैव सर्वश:।
मा च वोऽस्त्वशुभं किंचित् सर्वश: पाण्डुनन्दना:॥ १८॥
अनुवाद
पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर की यह बात सुनकर समस्त कुरुवंशी प्रसन्न हो गए और पाण्डवों का समर्थन करते हुए कहने लगे - 'पाण्डुकुमारों! मार्ग में समस्त प्राणियों का तुम पर सदैव आशीर्वाद बना रहे। तुम्हें कहीं से भी किसी प्रकार का अनिष्ट न मिले। 17-18॥
On hearing this from Yudhishthir, the son of Pandanu, all the Kuru clans became happy and started supporting the Pandavas, saying - 'Pandukumars! May you always be blessed by all living beings on the way. May you not receive any kind of evil from anywhere. 17-18॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥