श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 142: धृतराष्ट्रके आदेशसे पाण्डवोंकी वारणावत-यात्रा  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  1.142.11 
वैशम्पायन उवाच
धृतराष्ट्रस्य तं काममनुबुध्य युधिष्ठिर:।
आत्मनश्चासहायत्वं तथेति प्रत्युवाच तम्॥ ११॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! युधिष्ठिर धृतराष्ट्र की इच्छा का रहस्य समझ गये, किन्तु विवश जानकर उन्होंने 'बहुत अच्छा' कहकर उनकी इच्छा स्वीकार कर ली।
 
Vaishmpayana says - Janamejaya! Yudhishthira understood the secret of Dhritarashtra's wish, but knowing that he was helpless, he accepted his wish saying 'very good'.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)