श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 141: दुर्योधनका धृतराष्ट्रसे पाण्डवोंको वारणावत भेज देनेका प्रस्ताव  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  1.141.24 
विनिद्रकरणं घोरं हृदि शल्यमिवार्पितम्।
शोकपावकमुद्‍भूतं कर्मणैतेन नाशय॥ २४॥
 
 
अनुवाद
मेरे हृदय में एक भयंकर काँटा चुभ रहा है, जो मुझे सोने नहीं देता। शोक की अग्नि प्रज्वलित हो गई है, कृपया इस (मेरे द्वारा प्रस्तावित) कार्य को पूर्ण करके मेरे हृदय की शोक अग्नि को बुझा दीजिए।॥24॥
 
There is a terrible thorn pricking my heart, which does not let me sleep. The fire of grief has ignited, please extinguish the fire of grief in my heart by completing this task (proposed by me).॥ 24॥
 
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि जतुगृहपर्वणि दुर्योधनपरामर्शे एकचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:॥ १४१॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत जतुगृहपर्वमें दुर्योधनपरामर्शविषयक एक सौ इकतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १४१॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)