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श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 141: दुर्योधनका धृतराष्ट्रसे पाण्डवोंको वारणावत भेज देनेका प्रस्ताव  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  1.141.16 
धृतराष्ट्र उवाच
दुर्योधन ममाप्येतद् हृदि सम्परिवर्तते।
अभिप्रायस्य पापत्वान्नैवं तु विवृणोम्यहम्॥ १६॥
 
 
अनुवाद
धृतराष्ट्र बोले - दुर्योधन ! मैं भी मन ही मन यही सोच रहा हूँ; किन्तु हमारी नीयत पापपूर्ण है, इसलिए मैं खुलकर कहने में असमर्थ हूँ।
 
Dhritarashtra said - Duryodhan! I too am thinking the same thing in my heart; but our intention is sinful, so I am unable to say it openly.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)