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श्लोक 1.140.37  |
सततं निरयं प्राप्ता: परपिण्डोपजीविन:।
न भवेम यथा राजंस्तथा नीतिर्विधीयताम्॥ ३७॥ |
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| अनुवाद |
| हे राजन! ऐसी नीति अपनाइए कि हमें दूसरों के दिए हुए अन्न पर निर्वाह करके सदा नरक का दुःख न भोगना पड़े॥37॥ |
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| O King! Please adopt such a policy that we do not have to live on the food given by others and suffer the pain of hell forever. ॥ 37॥ |
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