श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 140: पाण्डवोंके प्रति पुरवासियोंका अनुराग देखकर दुर्योधनकी चिन्ता  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  1.140.17 
जनमेजय उवाच
पुनर्विस्तरश: श्रोतुमिच्छामि द्विजसत्तम।
दाहं जतुगृहस्यैव पाण्डवानां च मोक्षणम्॥ १७॥
 
 
अनुवाद
जनमेजय बोले - हे ब्राह्मण! मैं लाक्षागृह के दग्ध होने तथा पाण्डवों के वहाँ से निकल भागने का वृत्तान्त पुनः विस्तारपूर्वक सुनना चाहता हूँ॥ 17॥
 
Janamejaya said - O Brahmin! I wish to hear again in detail the story of the burning of Lakshagruha and the escape of the Pandavas from it.॥ 17॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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