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mahabharat 1.140.1-2: वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय! इसके बाद सुबाला के पुत्र शकुनि, राजा दुर्योधन, दुःशासन और कर्ण ने आपस में एक दुष्ट गुप्त मंत्रणा की। उन्होंने कुरुनन्दन महाराज धृतराष्ट्र से अनुमति लेकर कुन्ती को उसके पुत्रों सहित अग्नि में जलाने का विचार किया। 1-2॥   |   mahabharat अध्याय 1.140: पाण्डवोंके प्रति पुरवासियोंका अनुराग देखकर दुर्योधनकी चिन्ता   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 140: पाण्डवोंके प्रति पुरवासियोंका अनुराग देखकर दुर्योधनकी चिन्ता  »  श्लोक 1-2
 
 
श्लोक  1.140.1-2 
वैशम्पायन उवाच
तत: सुबलपुत्रस्तु राजा दुर्योधनश्च ह।
दु:शासनश्च कर्णश्च दुष्टं मन्त्रममन्त्रयन्॥ १॥
ते कौरव्यमनुज्ञाप्य धृतराष्ट्रं नराधिपम्।
दहने तु सपुत्राया: कुन्त्या बुद्धिमकारयन्॥ २॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय! इसके बाद सुबाला के पुत्र शकुनि, राजा दुर्योधन, दुःशासन और कर्ण ने आपस में एक दुष्ट गुप्त मंत्रणा की। उन्होंने कुरुनन्दन महाराज धृतराष्ट्र से अनुमति लेकर कुन्ती को उसके पुत्रों सहित अग्नि में जलाने का विचार किया। 1-2॥
 
Vaishampayanji says – Janamejaya! Thereafter Subala's son Shakuni, King Duryodhana, Dushasana and Karna held a wicked secret counsel among themselves. Taking permission from Kurunandan Maharaj Dhritarashtra, he thought of burning Kunti along with her sons in fire. 1-2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)