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mahabharat 1.14.3: इसी समय नागराज वासुकी अपनी बहन के साथ ऋषि के समक्ष पहुंचे और बोले, ‘कृपया इस भिक्षा को स्वीकार करें।’ परंतु ऋषि ने यह सोचकर उसे तुरंत स्वीकार नहीं किया कि कहीं उसका नाम भी उनके नाम जैसा न हो।   |   mahabharat अध्याय 1.14: जरत्कारुद्वारा वासुकिकी बहिनका पाणिग्रहण   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 14: जरत्कारुद्वारा वासुकिकी बहिनका पाणिग्रहण  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  1.14.3 
तं वासुकि: प्रत्यगृह्णादुद्यम्य भगिनीं तदा।
न स तां प्रतिजग्राह न सनाम्नीति चिन्तयन्॥ ३॥
 
 
अनुवाद
इसी समय नागराज वासुकी अपनी बहन के साथ ऋषि के समक्ष पहुंचे और बोले, ‘कृपया इस भिक्षा को स्वीकार करें।’ परंतु ऋषि ने यह सोचकर उसे तुरंत स्वीकार नहीं किया कि कहीं उसका नाम भी उनके नाम जैसा न हो।
 
At this time, King of Serpents Vasuki arrived with his sister before the sage and said, 'Please accept this alms.' But the sage did not accept it immediately, thinking that she may not have the same name as him.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)