श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 139: कणिकका धृतराष्ट्रको कूटनीतिका उपदेश  »  श्लोक 93
 
 
श्लोक  1.139.93 
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्त्वा सम्प्रतस्थे कणिक: स्वगृहं तत:।
धृतराष्ट्रोऽपि कौरव्य: शोकार्त: समपद्यत॥ ९३॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायन कहते हैं, "हे राजन! ऐसा कहकर कणिक अपने घर चले गये। इधर, कुरुवंश के राजा धृतराष्ट्र शोक से व्याकुल हो गये।
 
Vaishampayana says, "O King! Saying this, Kanik left for his home. Here, Dhritarashtra of the Kuru dynasty became distraught with grief.
 
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि कणिकवाक्ये एकोनचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:॥ १३९॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें कणिकवाक्यविषयक एक सौ उन्तालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १३९॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)