श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 139: कणिकका धृतराष्ट्रको कूटनीतिका उपदेश  »  श्लोक 80
 
 
श्लोक  1.139.80 
संग्रहे विग्रहे चैव यत्न: कार्योऽनसूयता।
उत्साहश्चापि यत्नेन कर्तव्यो भूतिमिच्छता॥ ८०॥
 
 
अनुवाद
धन की इच्छा रखने वाले राजा को चाहिए कि वह दूसरों के दोष न बताए, अपितु सदैव आवश्यक वस्तुओं का संग्रह करने तथा शत्रुओं से युद्ध करने का प्रयत्न करे; साथ ही अपने उत्साह को बनाए रखने का भी प्रयत्न करे ॥80॥
 
A king who desires wealth should not point out the faults of others but should always try to collect the necessary things and fight with the enemies; at the same time, he should try to maintain his enthusiasm. ॥ 80॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)