क्रुद्धोऽप्यक्रुद्धरूप: स्यात् स्मितपूर्वाभिभाषिता।
न चाप्यन्यमपध्वंसेत् कदाचित् कोपसंयुत:॥ ५५॥
प्रहरिष्यन् प्रियं ब्रूयात् प्रहरन्नपि भारत।
प्रहृत्य च कृपायीत शोचेत च रुदेत च॥ ५६॥
अनुवाद
मन क्रोध से भरा हुआ हो, तो भी ऊपर से क्रोध से रहित रहना चाहिए और मुस्कुराते हुए बात करनी चाहिए। क्रोध में कभी किसी का अपमान नहीं करना चाहिए। भारत! शत्रु पर आक्रमण करने से पहले और आक्रमण करते समय भी उससे मधुर वचन बोलना चाहिए। शत्रु को मारने के बाद भी उस पर दया करनी चाहिए, उसके लिए शोक करना चाहिए, रोना और आँसू बहाना चाहिए।॥ 55-56॥
Even if the mind is filled with anger, one should remain free from anger on the surface and talk with a smile. Never insult anyone in anger. Bhaarat! Before attacking the enemy and even while attacking, speak to him with sweet words. Even after killing the enemy, show mercy towards him, grieve for him and cry and shed tears.॥ 55-56॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥