तत: प्रत्यागते काले भिन्द्याद् घटमिवाश्मनि।
अमित्रो न विमोक्तव्य: कृपणं बह्वपि ब्रुवन्॥ २२॥
कृपा न तस्मिन् कर्तव्या हन्यादेवापकारिणम्।
हन्यादमित्रं सान्त्वेन तथा दानेन वा पुन:॥ २३॥
तथैव भेददण्डाभ्यां सर्वोपायै: प्रशातयेत्।
अनुवाद
'परन्तु जब समय तुम्हारे अनुकूल हो, तब उसे उसी प्रकार नष्ट कर दो, जैसे घड़े को पत्थर पर पटककर तोड़ देते हो। शत्रु यदि बहुत दयनीय बातें भी करे, तो भी उसे जीवित नहीं छोड़ना चाहिए। उस पर दया नहीं करनी चाहिए। जो शत्रु तुम्हारा अनिष्ट करे, उसे अवश्य मार डालना चाहिए। शत्रु को सब प्रकार से मार डालो, चाहे शांति से, दान से, चाहे भेद से, चाहे दण्ड से - उसे नष्ट कर दो।'॥22-23 1/2॥
‘But when the time is favorable to you, then destroy him in the same way as you break a pot by throwing it on a stone. Even if the enemy speaks very pitifully, he should not be left alive. He should not be shown mercy. The enemy who harms you must be killed. Kill the enemy by all means, whether by peace or charity, or by discrimination or punishment – destroy him.’॥ 22-23 1/2॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥