वधमेव प्रशंसन्ति शत्रूणामपकारिणाम्।
सुविदीर्णं सुविक्रान्तं सुयुद्धं सुपलायितम्॥ १०॥
आपद्यापदि काले च कुर्वीत न विचारयेत्।
नावज्ञेयो रिपुस्तात दुर्बलोऽपि कथंचन॥ ११॥
अनुवाद
'जो शत्रु तुम्हारा अनिष्ट करें, उन्हें मार डालना चाहिए, यही बुद्धिमान पुरुष स्तुति करते हैं। अत्यन्त बलवान शत्रु को भी संकट में पड़ने पर सरलता से नष्ट कर देना चाहिए। इसी प्रकार जो शत्रु अच्छी तरह युद्ध करता है, उसे भी संकट के समय सरलता से मार डालना चाहिए। संकट के समय शत्रु को अवश्य मार डालना चाहिए। उस समय उसके सम्बन्धी या मित्रता आदि का कभी विचार न करना। हे प्रिय! शत्रु यदि दुर्बल भी हो, तो भी उसकी किसी प्रकार उपेक्षा न करना।॥10-11॥
‘The enemies who harm you should be killed, this is what the wise men praise. Even a very powerful enemy should be easily destroyed when he is in trouble. Similarly, an enemy who fights well should also be easily killed in times of trouble. The enemy must be killed in times of trouble. At that time, never think of his relations or friendship etc. O dear! Even if the enemy is weak, do not ignore him in any way.॥ 10-11॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥