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mahabharat 1.138.3: इसके बाद कुछ ही दिनों में कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर ने अपनी शील (सदाचार), वृत्त (सदाचार और अच्छा व्यवहार) और समाधि (मन लगाकर प्रजा की सेवा करने की प्रवृत्ति) से अपने पिता महाराज पाण्डु की कीर्ति को भी पीछे छोड़ दिया।॥ 3॥   |   mahabharat अध्याय 1.138: युधिष्ठिरका युवराजपदपर अभिषेक, पाण्डवोंके शौर्य, कीर्ति और बलके विस्तारसे धृतराष्ट्रको चिन्ता   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 138: युधिष्ठिरका युवराजपदपर अभिषेक, पाण्डवोंके शौर्य, कीर्ति और बलके विस्तारसे धृतराष्ट्रको चिन्ता  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  1.138.3 
ततोऽदीर्घेण कालेन कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिर:।
पितुरन्तर्दधे कीर्तिं शीलवृत्तसमाधिभि:॥ ३॥
 
 
अनुवाद
इसके बाद कुछ ही दिनों में कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर ने अपनी शील (सदाचार), वृत्त (सदाचार और अच्छा व्यवहार) और समाधि (मन लगाकर प्रजा की सेवा करने की प्रवृत्ति) से अपने पिता महाराज पाण्डु की कीर्ति को भी पीछे छोड़ दिया।॥ 3॥
 
After this, in a few days, Yudhishthira, the son of Kunti, overshadowed the fame of his father Maharaja Pandu by his Śīla (good nature), Vṛtta (good conduct and good behavior) and Samādhi (the tendency of serving the people with full attention).॥ 3॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)