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mahabharat 1.138.25: इसी प्रकार एक ही रथ पर सवार होकर यात्रा करते हुए धनंजय ने दक्षिण दिशा को भी जीत लिया और अपने 'धनंजय' नाम को चरितार्थ करते हुए कुरु देश की राजधानी में बहुत-सा धन पहुँचा दिया॥ 25॥   |   mahabharat अध्याय 1.138: युधिष्ठिरका युवराजपदपर अभिषेक, पाण्डवोंके शौर्य, कीर्ति और बलके विस्तारसे धृतराष्ट्रको चिन्ता   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 138: युधिष्ठिरका युवराजपदपर अभिषेक, पाण्डवोंके शौर्य, कीर्ति और बलके विस्तारसे धृतराष्ट्रको चिन्ता  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  1.138.25 
तथैवैकरथो गत्वा दक्षिणामजयद् दिशम्।
धनौघं प्रापयामास कुरुराष्ट्रं धनंजय:॥ २५॥
 
 
अनुवाद
इसी प्रकार एक ही रथ पर सवार होकर यात्रा करते हुए धनंजय ने दक्षिण दिशा को भी जीत लिया और अपने 'धनंजय' नाम को चरितार्थ करते हुए कुरु देश की राजधानी में बहुत-सा धन पहुँचा दिया॥ 25॥
 
Similarly, travelling in a single chariot, Dhananjaya conquered the southern direction as well and, justifying his name 'Dhananjaya', delivered a lot of wealth to the capital of Kuru country.॥ 25॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)