अध्याय 137: द्रोणका शिष्योंद्वारा द्रुपदपर आक्रमण करवाना, अर्जुनका द्रुपदको बंदी बनाकर लाना और द्रोणद्वारा द्रुपदको आधा राज्य देकर मुक्त कर देना
श्लोक 1: वैशम्पायनजी कहते हैं - हे राजन! पाण्डवपुत्रों और धृतराष्ट्र को अस्त्र-शस्त्र विद्या में निपुण देखकर द्रोणाचार्य ने गुरु दक्षिणा लेने का समय जानकर मन में निश्चय किया ॥1॥
श्लोक 2: जनमेजय! तत्पश्चात आचार्य ने अपने शिष्यों को बुलाकर उनसे इस प्रकार गुरुदक्षिणा माँगी -॥2॥
श्लोक 3: ‘शिष्यों! युद्ध में पांचाल नरेश द्रुपद को पकड़कर मेरे पास ले आओ। तुम्हारा कल्याण हो। यही मेरे लिए सर्वोत्तम गुरु दक्षिणा होगी।’॥3॥
श्लोक 4: फिर 'बहुत अच्छा' कहकर वे सभी राजकुमार (युद्ध के लिए तत्पर) जो आक्रमण करने के लिए तत्पर थे, अपने रथों पर बैठकर आचार्य द्रोण के साथ गुरुदक्षिणा देने के लिए वहाँ से चले॥4॥
श्लोक 5-7: तदनन्तर दुर्योधन, कर्ण, पराक्रमी युयुत्सु, दु:शासन, विकर्ण, जलसन्ध और सुलोचना - ये तथा अन्य अनेक पराक्रमी राजकुमार, जो पुरुषों में श्रेष्ठ और क्षत्रियों में परम प्रतापी थे, 'मैं पहले युद्ध करूँगा, मैं पहले युद्ध करूँगा' ऐसा कहते हुए पांचाल देश में पहुँचे और वहाँ के निवासियों का संहार करते हुए उन्होंने पराक्रमी राजा द्रुपद की राजधानी को भी रौंद डाला।
श्लोक 8: सभी राजकुमार उत्तम रथों पर बैठकर अपने घुड़सवारों के साथ नगर में प्रवेश कर राजमार्ग पर चलने लगे।
श्लोक 9: जनमेजय! उस समय कौरवों के आक्रमण का समाचार सुनकर तथा उनकी विशाल सेना को अपनी आँखों से देखकर पांचाल नरेश द्रुपद अपने भाइयों सहित बड़ी शीघ्रता से महल से बाहर आये।
श्लोक 10: महाराज यज्ञसेन (द्रुपद) और उनके सब भाइयों ने कवच धारण कर लिए। फिर वे सब बाण बरसाते हुए बड़े जोर से गर्जना करने लगे॥10॥
श्लोक 11: राजा द्रुपद को युद्ध में पराजित करना बहुत कठिन था। वे एक चमकते हुए रथ पर सवार होकर कौरवों के सामने पहुँचे और भयंकर बाणों की वर्षा करने लगे। 11.
श्लोक 12: वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! कौरवों आदि राजकुमारों को अपने बल और पराक्रम पर बड़ा गर्व था; इसलिए अर्जुन ने उचित परामर्श करके महाब्राह्मण द्रोणाचार्य से कहा -॥12॥
श्लोक 13: गुरुदेव! जब वे अपना पराक्रम दिखा देंगे, तब हम युद्ध करेंगे। हमारा विश्वास है कि ये लोग युद्ध में पांचालराज को नहीं पकड़ सकते।॥13॥
श्लोक 14: ऐसा कहकर निष्पाप कुन्तीपुत्र अर्जुन अपने भाइयों के साथ नगर के बाहर आधा कोस की दूरी पर रुक गये।
श्लोक 15-16: कौरवों को देखते ही राजा द्रुपद ने उन पर चारों ओर से आक्रमण कर दिया और बाणों का विशाल जाल बिछाकर कौरव सेना को स्तब्ध कर दिया। यद्यपि युद्ध में फुर्ती दिखाने वाले राजा द्रुपद रथ पर बैठकर अकेले ही बाणों की वर्षा कर रहे थे, तथापि अत्यन्त भयभीत होकर कौरव उन्हें भी बहुतों में से एक मानने लगे॥15-16॥
श्लोक 17-19h: द्रुपद के भयंकर बाण चारों दिशाओं में उड़ने लगे। महाराज! उनकी विजय देखकर पांचालों के घरों में शंख, भेरी और मृदंग आदि सहस्त्रों वाद्य एक साथ बजने लगे। आत्म-विश्वास से संपन्न पांचाल सैनिक ज़ोर-ज़ोर से गर्जना करने लगे। साथ ही उनके धनुष की टंकार की गूँज आकाश में गूँजने लगी।
श्लोक 19-22: उस समय दुर्योधन, विकर्ण, सुबाहु, दीर्घलोचन और दु:शासन बड़े क्रोध में भरकर बाणों की वर्षा करने लगे। भारत! युद्ध में कभी पराजित न होने वाले महाधनुर्धर द्रुपद अत्यन्त घायल होकर तत्काल उनकी समस्त सेनाओं को महान् कष्ट देने लगे। वे अग्निचक्र के समान सम्पूर्ण दिशाओं में घूमते हुए दुर्योधन, विकर्ण, महाबली कर्ण, अनेक वीर राजकुमारों और उनकी विविध सेनाओं को बाणों से तृप्त करने लगे।॥19-22॥
श्लोक d1-23: उन्होंने दु:शासन को दस, विकर्ण को बीस और शकुनि को तीस तीखे भेदी बाणों से घायल कर दिया। तत्पश्चात शत्रुओं का संहार करने वाले द्रुपद ने कर्ण और दुर्योधन के शरीर के सभी अंगों की संधियों में अलग-अलग अट्ठाईस बाण मारे। उन्होंने सुबाहु को पाँच बाणों से घायल किया और सहसा अन्य योद्धाओं को नाना प्रकार के बाणों से बींध डाला और फिर बड़े जोर से गर्जना की। इस प्रकार क्रोध से गर्जना करते हुए समस्त शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ पांचालराज द्रुपद ने शत्रुओं के धनुष, रथ, घोड़े और रंग-बिरंगी ध्वजाएँ काट डालीं। तत्पश्चात समस्त पांचाल सैनिक सिंह के समान गर्जना करने लगे। तब उस नगर के समस्त निवासी कौरवों पर टूट पड़े और उन पर वर्षा करने वाले मेघों के समान मूसलों और दण्डों की वर्षा करने लगे॥23॥
श्लोक 24-26: उस समय नगर के सभी नागरिक, बालकों से लेकर वृद्धों तक, कौरवों से युद्ध कर रहे थे। जनमेजय! गुप्तचरों से यह सुनकर कि वहाँ घोर युद्ध हो रहा है, कौरव लगभग नगण्य हो गए हैं, पांचाल नरेश द्रुपद के बाणों से कर्ण का सारा शरीर घायल हो गया है, वह भयभीत होकर रथ से कूदकर भाग गया और कौरव सैनिक चीखते और कराहते हुए हम पाण्डवों की ओर दौड़ रहे हैं; पीड़ित सैनिकों का रोमांचकारी क्रन्दन सुनकर पाण्डवों ने आचार्य द्रोण को प्रणाम किया, अपने रथों पर बैठ गए और शीघ्रतापूर्वक वहाँ से चले गए। अर्जुन ने पाण्डवपुत्र युधिष्ठिर को यह कहकर रोक दिया कि 'तुम्हें युद्ध नहीं करना चाहिए'॥ 24-26॥
श्लोक 27: उस समय अर्जुन ने माद्री के पुत्रों नकुल और सहदेव को अपने रथ के पहियों की रक्षा के लिए नियुक्त किया। भीमसेन सदैव हाथ में गदा लेकर सेना के आगे चलते थे।
श्लोक 28: तत्पश्चात् शत्रुओं की गर्जना सुनकर निर्दोष अर्जुन अपने भाइयों सहित बड़े वेग से आगे बढ़े, रथ की घरघराहट से सारी दिशाएँ गूंज उठीं।
श्लोक 29-30: पांचाल सेना अपनी उत्ताल तरंगों से भरे हुए समुद्र के समान गर्जना कर रही थी। महाबाहु भीमसेन हाथ में दंड लेकर उस विशाल सेना में यमराज के समान घुस गए, जैसे मगरमच्छ समुद्र में प्रवेश करता है। गदाधारी भीमसेन ने स्वयं हाथियों की सेना पर आक्रमण किया।
श्लोक 31: कुंतीपुत्र भीम न केवल युद्ध में कुशल थे, बल्कि शारीरिक बल में भी उनका कोई सानी नहीं था। उन्होंने मृत्यु का रूप धारण कर लिया और अपनी गदा के प्रहार से हाथियों की सेना का संहार करने लगे।
श्लोक 32-35h: भीमसेन की गदा से सिर फट जाने से, वे पर्वतों के समान विशाल हाथी, वज्र के प्रहार से रक्तपात करते हुए पर्वतों की भाँति भूमि पर गिरने लगे। पाण्डवपुत्र भीमसेन, जो अर्जुन के बड़े भाई थे, ने हाथियों, घोड़ों और रथों का नाश कर दिया। उन्होंने पैदल सैनिकों और सारथिओं का संहार कर दिया। जैसे ग्वाला वन में लाठी से पशुओं को भगाता है, उसी प्रकार भीमसेन ने रथियों और हाथियों का पीछा करते हुए उनका पीछा करना आरम्भ कर दिया। 32-34 1/2।
श्लोक 35-37h: वैशम्पायन कहते हैं - हे राजन! उस समय पाण्डवपुत्र अर्जुन ने द्रोणाचार्य को प्रसन्न करने के लिए द्रुपद पर बाणों की वर्षा करते हुए आक्रमण किया। वह प्रलयकाल की अग्नि के समान प्रज्वलित होकर युद्धस्थल में सब ओर से घोड़ों, रथों और हाथियों के समूहों को नष्ट कर रहा था।
श्लोक 37-38: उसके बाणों से घायल हुए पांचाल वीरों और संजय ने तुरन्त ही अर्जुन पर नाना प्रकार के बाणों की वर्षा करके उसे चारों ओर से घेर लिया और जोर से गर्जना करते हुए उससे युद्ध करने लगे।
श्लोक 39: वह युद्ध देखने में अत्यंत भयानक और अद्भुत था। शत्रुओं की गर्जना सुनकर इन्द्रकुमार अर्जुन उसे सहन नहीं कर सके।
श्लोक 40: उस युद्ध में किरीटधारी पार्थ ने बाणों का विशाल जाल बिछाकर अचानक पांचालों पर आक्रमण कर दिया, जिससे वे व्याकुल हो गये।
श्लोक 41: यशस्वी अर्जुन बड़ी फुर्ती से बाण चलाते थे और निरन्तर नये बाण चलाते रहते थे। धनुष पर बाण चढ़ाने और फिर छोड़ने में किंचितमात्र भी अन्तर नहीं होता था॥ 41॥
श्लोक d6-d7h: महाराज! उस युद्ध में न दिशाएँ दिखाई दे रही थीं, न आकाश, न पृथ्वी, न ही कुछ और। महाबली गाण्डीवधारी अर्जुन ने अपने बाणों से चारों ओर अन्धकार फैला रखा था।
श्लोक 42-43: उस समय पांडव सेना जयजयकार कर रही थी। इसी बीच, पांचाल नरेश द्रुपद ने अपने भाई सत्यजित के साथ मिलकर अर्जुन पर बड़े वेग से आक्रमण किया, जैसे शम्बरासुर ने देवराज इंद्र पर आक्रमण किया था। किन्तु कुंतीपुत्र अर्जुन ने बाणों की भारी वर्षा करके पांचाल नरेश को ढक लिया।
श्लोक 44: और जैसे सिंह हाथियों के दल के सरदार को पकड़ने का प्रयत्न करता है, वैसे ही अर्जुन द्रुपद को पकड़ने ही वाले थे कि पांचाल सेना में भगदड़ मच गई ॥44॥
श्लोक 45-46: वीर सत्यजित् ने देखा कि कुन्तीपुत्र धनंजय पांचालराज को पकड़ने के लिए निकट आ रहा है, अतः वह उसकी रक्षा के लिए अर्जुन पर चढ़ गया; तदनन्तर इन्द्र और बालिकी के समान अर्जुन और पांचाल सत्यजित् युद्ध के लिए आमने-सामने आ गए और समस्त सेनाओं में खलबली मचा दी ॥45-46॥
श्लोक 47: तब अर्जुन ने सत्यजित् को दस गहरे बाणों से बलपूर्वक घायल कर दिया। यह अद्भुत घटना थी।
श्लोक 48-49: तत्पश्चात् पांचाल योद्धा सत्यजित ने भी शीघ्रतापूर्वक सौ बाण चलाकर अर्जुन को पीड़ा पहुँचाई। उनके बाणों की वर्षा से आच्छादित होकर महारथी अर्जुन ने धनुष की डोरी साफ की और बड़े वेग से बाण चलाने लगे। सत्यजित का धनुष काटकर उन्होंने राजा द्रुपद पर आक्रमण किया। 48-49।
श्लोक 50: तब सत्यजित ने दूसरा शक्तिशाली धनुष उठाया और तुरन्त ही अर्जुन को उसके घोड़े, सारथि और रथसहित घायल कर दिया।
श्लोक 51: अर्जुन युद्ध में पांचाल योद्धा सत्यजित् से पीड़ित हो गए और उसके पराक्रम का सामना न कर सके और उसे नष्ट करने के लिए शीघ्रतापूर्वक बाणों की वर्षा करने लगे ॥ 51॥
श्लोक 52-54: अर्जुन ने सत्यजित् के घोड़े, ध्वज, धनुष, मुट्ठियों, दोनों पार्श्वरक्षकों और सारथि को नष्ट कर दिया। इस प्रकार धनुष के बार-बार टूट जाने और घोड़ों के मारे जाने पर सत्यजित् युद्धभूमि से भाग गया। राजन! उसे युद्ध से विमुख होते देख पांचालराज द्रुपद ने पाण्डुनंदन अर्जुन पर बड़े वेग से बाणों की वर्षा आरम्भ कर दी। तब विजयी योद्धाओं में श्रेष्ठ अर्जुन ने उनके साथ अत्यन्त भीषण युद्ध आरम्भ कर दिया। 52-54॥
श्लोक 55: उसने पांचाल राजा का धनुष काट डाला, उसकी ध्वजा भी भूमि पर गिरा दी, फिर पाँच बाणों से उसके घोड़ों और सारथि को घायल कर दिया।
श्लोक 56: तत्पश्चात् जब वे टूटे हुए धनुष को छोड़कर दूसरा धनुष और तरकश उठाने ही वाले थे, तब अर्जुन ने म्यान से तलवार खींच ली और सिंह के समान दहाड़ने लगे।
श्लोक 57-58: और अचानक वह पांचालराज के रथ के डंडे पर कूद पड़ा। इस प्रकार द्रुपद के रथ पर सवार निर्भय अर्जुन ने उसे अपने वश में कर लिया, जैसे गरुड़ समुद्र को क्षुब्ध करके सर्प को पकड़ लेते हैं। तब समस्त पांचाल सैनिक (भयभीत होकर) चारों ओर भागने लगे। 57-58।
श्लोक 59: अर्जुन अपने समस्त सैनिकों को अपना पराक्रम दिखाकर सिंह के समान गर्जना करते हुए वहाँ से लौट आये।
श्लोक 60: अर्जुन को आते देख सभी राजकुमार एकत्र हो गए और महात्मा द्रुपद की नगरी को नष्ट करने लगे।
श्लोक 61: तब अर्जुन ने कहा- भैया भीमसेन! राजाओं में श्रेष्ठ द्रुपद कौरव योद्धाओं के सगे-संबंधी हैं, अतः उनकी सेना का संहार न करो; केवल राजा द्रुपद को गुरुदक्षिणा के रूप में द्रुण को दे दो॥61॥
श्लोक 62: वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय ! उस समय अर्जुन के मना करने पर भी महाबली भीमसेन संतुष्ट न होते हुए भी युद्धाभ्यास से निवृत्त हो गए ॥62॥
श्लोक 63: भरतश्रेष्ठ जनमेजय! उन पाण्डवों ने युद्धस्थल में यज्ञसेन द्रुपद को उनके मन्त्रियों सहित पकड़कर द्रोणाचार्य को दान में दे दिया॥63॥
श्लोक 64: उसका अभिमान चूर हो गया, उसकी सम्पत्ति छीन ली गई और वह पूर्णतया पराधीन हो गया; उस समय द्रोणाचार्य ने मन में पूर्वकाल के वैर का स्मरण करके राजा द्रुपद से कहा-॥64॥
श्लोक 65: ‘राजन्! मैंने बलपूर्वक तुम्हारे राष्ट्र का नाश किया। तुम्हारी राजधानी को नष्ट कर दिया। अब तुम शत्रुओं के चंगुल में पड़कर प्राण त्यागकर यहाँ आये हो। बताओ, क्या तुम पुनः पुरानी मित्रता चाहते हो?’॥65॥
श्लोक 66: यह कहकर द्रोणाचार्य थोड़ा हँसे। फिर वे उनसे इस प्रकार बोले—'वीरों! अपने प्राणों को संकट में जानकर भी भयभीत मत होओ। हम क्षमाशील ब्राह्मण हैं।'
श्लोक 67: 'क्षत्रिय शिरोमणे! तुम बाल्यकाल में आश्रम में मेरे साथ खेले थे, उसी के कारण मेरा तुम्हारे प्रति स्नेह और प्रेम बहुत बढ़ गया है॥ 67॥
श्लोक 68: हे मनुष्यों के स्वामी! मैं आपसे पुनः मित्रता की प्रार्थना करता हूँ। हे राजन! मैं आपको वरदान देता हूँ कि आप इस राज्य का आधा भाग मुझसे ले लें।
श्लोक 69: 'यज्ञसेन! आपने कहा था - जो राजा नहीं है, वह राजा का मित्र नहीं हो सकता; इसीलिए मैंने आपका राज्य लेने का प्रयत्न किया है।
श्लोक 70: आप गंगा के दक्षिण प्रदेश के राजा हैं और मैं उत्तर प्रदेश का राजा हूँ। पांचाल! अब यदि आप उचित समझें तो मुझे अपना मित्र मान लीजिए॥ 70॥
श्लोक 71: द्रुपद बोले - हे ब्रह्मन्! आप जैसे महाबली पुरुष में ऐसी उदारता होना कोई आश्चर्य की बात नहीं है। मैं आपसे अत्यंत प्रसन्न हूँ और आपसे चिरस्थायी मैत्री और प्रेम रखना चाहता हूँ ॥ 71॥
श्लोक 72: वैशम्पायन कहते हैं, 'भरत! द्रुपद की यह बात सुनकर द्रोणाचार्य ने उन्हें मुक्त कर दिया और प्रसन्न होकर उनका आदर-सत्कार किया तथा उन्हें आधा राज्य दे दिया।
श्लोक 73-74: तत्पश्चात् राजा द्रुपद ने विनम्र मन से गंगा के तट पर अनेक जनपदों से युक्त मकन्दीपुरी में तथा नगरों में श्रेष्ठ काम्पिल्य नगर में निवास किया और चर्मण्वती नदी के दक्षिण तट पर स्थित पांचालदेश पर शासन करने लगे। इस प्रकार द्रोणाचार्य ने द्रुपद को परास्त करके पुनः उनकी रक्षा की। 73-74॥
श्लोक 75-76: द्रुपद अपनी क्षात्र सेना से द्रोणाचार्य को पराजित होते न देख सके । ब्राह्मणों के बल के आगे अपने को हीन मानकर वे (द्रोणाचार्य को परास्त करने के लिए) एक शक्तिशाली पुत्र की इच्छा से पृथ्वी पर विचरण करने लगे । इधर द्रोणाचार्य (उत्तर-पांचलवर्ती) ने अहिच्छत्र नामक राज्य पर अधिकार कर लिया । 75-76॥
श्लोक 77: राजन! इस प्रकार अनेक जनपदों से समृद्ध अहिच्छत्र नामक नगर को युद्ध में जीतकर अर्जुन ने उसे गुरु-दक्षिणा के रूप में द्रोणाचार्य को दे दिया। 77॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥