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श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 136: भीमसेनके द्वारा कर्णका तिरस्कार और दुर्योधनद्वारा उसका सम्मान  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  1.136.8 
एवमुक्तस्तत: कर्ण: किंचित्प्रस्फुरिताधर:।
गगनस्थं विनि:श्वस्य दिवाकरमुदैक्षत॥ ८॥
 
 
अनुवाद
भीमसेन की यह बात सुनकर कर्ण के होंठ क्रोध से कांपने लगे और उसने गहरी सांस लेकर आकाश में भगवान सूर्य की ओर देखा।
 
Karna's lips began to tremble in anger at hearing Bhimasena say this, and he took a deep breath and looked towards Lord Surya in the sky.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)