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mahabharat 1.136.1: वैशम्पायन कहते हैं, "जनमेजय!" तभी अधिरथ, जिसके पास केवल एक छड़ी थी, काँपता हुआ, मानो कर्ण को पुकार रहा हो, मंच पर आया। उसकी चादर खिसककर नीचे गिर गई थी और वह पसीने से लथपथ था।   |   mahabharat अध्याय 1.136: भीमसेनके द्वारा कर्णका तिरस्कार और दुर्योधनद्वारा उसका सम्मान   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 136: भीमसेनके द्वारा कर्णका तिरस्कार और दुर्योधनद्वारा उसका सम्मान  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  1.136.1 
वैशम्पायन उवाच
तत: स्रस्तोत्तरपट: सप्रस्वेद: सवेपथु:।
विवेशाधिरथो रङ्गं यष्टिप्राणो ह्वयन्निव॥ १॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायन कहते हैं, "जनमेजय!" तभी अधिरथ, जिसके पास केवल एक छड़ी थी, काँपता हुआ, मानो कर्ण को पुकार रहा हो, मंच पर आया। उसकी चादर खिसककर नीचे गिर गई थी और वह पसीने से लथपथ था।
 
Vaishampayana says, 'Janamejaya! Then Adhiratha, who had only a stick for support, came to the stage trembling as if calling out for Karna. His sheet had slipped and fallen down and he was soaked in sweat.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)