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mahabharat 1.135.d3h-40: तब ब्राह्मणों द्वारा सम्मानित होकर राजा कर्ण ने उन्हें अपार धन दिया। हे राजन! उस समय उसने कौरवों में श्रेष्ठ दुर्योधन से कहा - 'हे राजन! आपने मुझे जो राज्य दिया है, उसके अनुसार मैं आपको क्या दान दूँ? बताइए, आप जैसा कहेंगे, वैसा ही करूँगा।' यह सुनकर दुर्योधन ने कहा - 'अंगराज! मैं आपसे ऐसी मित्रता चाहता हूँ, जिसका कभी अन्त न हो।' ॥39-40॥   |   mahabharat अध्याय 1.135: कर्णका रंगभूमिमें प्रवेश तथा राज्याभिषेक   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 135: कर्णका रंगभूमिमें प्रवेश तथा राज्याभिषेक  »  श्लोक d3h-40
 
 
श्लोक  1.135.d3h-40 
(सभाज्यमानो विप्रैश्च प्रदत्त्वा ह्यमितं वसु।)
उवाच कौरवं राजन् वचनं स वृषस्तदा।
अस्य राज्यप्रदानस्य सदृशं किं ददानि ते॥ ३९॥
प्रब्रूहि राजशार्दूल कर्ता ह्यस्मि तथा नृप।
अत्यन्तं सख्यमिच्छामीत्याह तं स सुयोधन:॥ ४०॥
 
 
अनुवाद
तब ब्राह्मणों द्वारा सम्मानित होकर राजा कर्ण ने उन्हें अपार धन दिया। हे राजन! उस समय उसने कौरवों में श्रेष्ठ दुर्योधन से कहा - 'हे राजन! आपने मुझे जो राज्य दिया है, उसके अनुसार मैं आपको क्या दान दूँ? बताइए, आप जैसा कहेंगे, वैसा ही करूँगा।' यह सुनकर दुर्योधन ने कहा - 'अंगराज! मैं आपसे ऐसी मित्रता चाहता हूँ, जिसका कभी अन्त न हो।' ॥39-40॥
 
Then, being respected by the Brahmins, King Karna gave them immense wealth. O King! At that time he said to the best of the Kurus, Duryodhan - 'O King! What gift should I give you in accordance with the kingdom you have given me? Tell me, I will do as you say.' Hearing this, Duryodhan said - 'King of Angas! I want such a friendship with you which never ends.' ॥ 39-40॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)