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mahabharat 1.135.34: वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! कृपाचार्य के ऐसा कहने पर कर्ण का मुख लज्जा से झुक गया। जैसे वर्षा के जल में भीगकर कमल मुरझा जाता है, वैसे ही कर्ण का मुख भी पीला पड़ गया। 34.   |   mahabharat अध्याय 1.135: कर्णका रंगभूमिमें प्रवेश तथा राज्याभिषेक   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 135: कर्णका रंगभूमिमें प्रवेश तथा राज्याभिषेक  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  1.135.34 
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तस्य कर्णस्य व्रीडावनतमाननम्।
बभौ वर्षाम्बुविक्लिन्नं पद्ममागलितं यथा॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! कृपाचार्य के ऐसा कहने पर कर्ण का मुख लज्जा से झुक गया। जैसे वर्षा के जल में भीगकर कमल मुरझा जाता है, वैसे ही कर्ण का मुख भी पीला पड़ गया। 34.
 
Vaishampayana says - Janamejaya! When Krupacharya said this, Karna's face bowed down in shame. Just like a lotus withers after getting wet in the rain water, Karna's face also became pale. 34.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)