श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 132: अर्जुनके द्वारा लक्ष्यवेध, द्रोणका ग्राहसे छुटकारा और अर्जुनको ब्रह्मशिर नामक अस्त्रकी प्राप्ति  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  1.132.4 
मुहूर्तादिव तं द्रोणस्तथैव समभाषत।
पश्यस्येनं स्थितं भासं द्रुमं मामपि चार्जुन॥ ४॥
 
 
अनुवाद
मानो दो घड़ी के बाद द्रोणाचार्य ने उससे वही प्रश्न पूछा - 'अर्जुन! क्या तुम उस वृक्ष पर बैठे हुए गिद्ध को, वृक्ष को और मुझे भी देखते हो?'॥4॥
 
As if after two hours Dronacharya asked him the same question - 'Arjuna! Do you see the vulture sitting on that tree, the tree and me as well?'॥ 4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)