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mahabharat 1.132.21: 'वीर! यदि युद्ध में कोई मनुष्येतर शत्रु तुम्हें कष्ट देने लगे, तो तुम इस अस्त्र से उसका वध कर सकते हो।'॥21॥   |   mahabharat अध्याय 1.132: अर्जुनके द्वारा लक्ष्यवेध, द्रोणका ग्राहसे छुटकारा और अर्जुनको ब्रह्मशिर नामक अस्त्रकी प्राप्ति   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 132: अर्जुनके द्वारा लक्ष्यवेध, द्रोणका ग्राहसे छुटकारा और अर्जुनको ब्रह्मशिर नामक अस्त्रकी प्राप्ति  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  1.132.21 
बाधेतामानुष: शत्रुर्यदि त्वां वीर कश्चन।
तद्वधाय प्रयुञ्जीथास्तदस्त्रमिदमाहवे॥ २१॥
 
 
अनुवाद
'वीर! यदि युद्ध में कोई मनुष्येतर शत्रु तुम्हें कष्ट देने लगे, तो तुम इस अस्त्र से उसका वध कर सकते हो।'॥21॥
 
'Valiant! If any non-human enemy starts troubling you in battle, then you can use this weapon to kill him.'॥ 21॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)