Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 1.131.33-34: शत्रुओं को कष्ट देने वाला एकलव्य द्रोणाचार्य के चरणों में सिर झुकाकर वन में लौट आया और उनकी मिट्टी की मूर्ति बनाकर अपने गुरु के प्रति अत्यंत आदरभाव रखते हुए धनुर्विद्या का अभ्यास करने लगा। वह अत्यंत अनुशासित जीवन व्यतीत करता था। | mahabharat अध्याय 1.131: द्रोणाचार्यद्वारा राजकुमारोंकी शिक्षा, एकलव्यकी गुरुभक्ति तथा आचार्यद्वारा शिष्योंकी परीक्षा । mahabharat पर्व 1: आदि पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
स तु द्रोणस्य शिरसा पादौ गृह्य परंतप:।
अरण्यमनुसम्प्राप्य कृत्वा द्रोणं महीमयम्॥ ३३॥
तस्मिन्नाचार्यवृत्तिं च परमामास्थितस्तदा।
इष्वस्त्रे योगमातस्थे परं नियममास्थित:॥ ३४॥
अनुवाद
शत्रुओं को कष्ट देने वाला एकलव्य द्रोणाचार्य के चरणों में सिर झुकाकर वन में लौट आया और उनकी मिट्टी की मूर्ति बनाकर अपने गुरु के प्रति अत्यंत आदरभाव रखते हुए धनुर्विद्या का अभ्यास करने लगा। वह अत्यंत अनुशासित जीवन व्यतीत करता था।
Eklavya, the tormentor of enemies, bowed his head at the feet of Dronacharya and returned to the forest and made a clay idol of him and started practising archery with utmost respect for his teacher. He lived a very disciplined life.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥