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mahabharat 1.130.9: सत्य तो यह है कि निर्धन व्यक्ति धनवान का मित्र नहीं हो सकता, मूर्ख व्यक्ति विद्वान का मित्र नहीं हो सकता, तथा कायर व्यक्ति वीर का मित्र नहीं हो सकता; अतः पहले वाले की मित्रता पर विश्वास कैसे किया जा सकता है?   |   mahabharat अध्याय 1.130: द्रोणका द्रुपदसे तिरस्कृत हो हस्तिनापुरमें आना, राजकुमारोंसे उनकी भेंट, उनकी गुल्ली और अँगूठीको कुएँमेंसे निकालना एवं भीष्मका उन्हें अपने यहाँ सम्मानपूर्वक रखना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 130: द्रोणका द्रुपदसे तिरस्कृत हो हस्तिनापुरमें आना, राजकुमारोंसे उनकी भेंट, उनकी गुल्ली और अँगूठीको कुएँमेंसे निकालना एवं भीष्मका उन्हें अपने यहाँ सम्मानपूर्वक रखना  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  1.130.9 
न दरिद्रो वसुमतो नाविद्वान् विदुष: सखा।
न शूरस्य सखा क्लीब: सखिपूर्वं किमिष्यते॥ ९॥
 
 
अनुवाद
सत्य तो यह है कि निर्धन व्यक्ति धनवान का मित्र नहीं हो सकता, मूर्ख व्यक्ति विद्वान का मित्र नहीं हो सकता, तथा कायर व्यक्ति वीर का मित्र नहीं हो सकता; अतः पहले वाले की मित्रता पर विश्वास कैसे किया जा सकता है?
 
The truth is that a poor man cannot be a friend of a rich man, a fool cannot be a friend of a learned man and a coward cannot be a friend of a brave man; therefore, how can you trust the friendship of the former? 9.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)