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mahabharat 1.130.8: ऐसी मित्रता पर भरोसा मत करो जो मिट जाए। अपने हृदय से यह भाव निकाल दो कि हम मित्र थे। हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! मेरी और तुम्हारी मित्रता पहले केवल स्वार्थवश थी, जैसे साथ खेलना-कूदना और साथ पढ़ना।   |   mahabharat अध्याय 1.130: द्रोणका द्रुपदसे तिरस्कृत हो हस्तिनापुरमें आना, राजकुमारोंसे उनकी भेंट, उनकी गुल्ली और अँगूठीको कुएँमेंसे निकालना एवं भीष्मका उन्हें अपने यहाँ सम्मानपूर्वक रखना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 130: द्रोणका द्रुपदसे तिरस्कृत हो हस्तिनापुरमें आना, राजकुमारोंसे उनकी भेंट, उनकी गुल्ली और अँगूठीको कुएँमेंसे निकालना एवं भीष्मका उन्हें अपने यहाँ सम्मानपूर्वक रखना  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  1.130.8 
मैवं जीर्णमुपास्स्व त्वं सख्यं भवत्वपाकृधि।
आसीत् सख्यं द्विजश्रेष्ठ त्वया मेऽर्थनिबन्धनम्॥ ८॥
 
 
अनुवाद
ऐसी मित्रता पर भरोसा मत करो जो मिट जाए। अपने हृदय से यह भाव निकाल दो कि हम मित्र थे। हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! मेरी और तुम्हारी मित्रता पहले केवल स्वार्थवश थी, जैसे साथ खेलना-कूदना और साथ पढ़ना।
 
Do not trust such a friendship which fades away. Remove from your heart the notion that we were friends. O great Brahmin! My friendship with you earlier was based on selfish motives like playing and studying together.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)