श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 130: द्रोणका द्रुपदसे तिरस्कृत हो हस्तिनापुरमें आना, राजकुमारोंसे उनकी भेंट, उनकी गुल्ली और अँगूठीको कुएँमेंसे निकालना एवं भीष्मका उन्हें अपने यहाँ सम्मानपूर्वक रखना  »  श्लोक 77
 
 
श्लोक  1.130.77 
भीष्म उवाच
अपज्यं क्रियतां चापं साध्वस्त्रं प्रतिपादय।
भुङ्क्ष्व भोगान् भृशं प्रीत: पूज्यमान: कुरुक्षये॥ ७७॥
 
 
अनुवाद
भीष्म ने कहा, "अब तुम अपने धनुष की प्रत्यंचा उतार दो और यहीं रहकर राजकुमारों को धनुर्वेद और अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा दो। कौरवों के घर में सदैव प्रतिष्ठित रहो और अत्यंत सुखपूर्वक अपनी इच्छानुसार भोग भोगो।"
 
Bhishma said, "Now take off the string of your bow and stay here and teach the princes about Dhanur Veda and weapons. Always remain respected in the Kauravas' house and enjoy the pleasures of your choice with utmost happiness." 77.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)