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mahabharat 1.130.74: जाते समय मैंने एक वचन दिया था जिसे मैं शीघ्र ही पूरा करूँगा। द्रुपद द्वारा मेरे प्रति कहे गए तिरस्कारपूर्ण शब्दों के कारण मैं अत्यंत दुःखी हूँ।   |   mahabharat अध्याय 1.130: द्रोणका द्रुपदसे तिरस्कृत हो हस्तिनापुरमें आना, राजकुमारोंसे उनकी भेंट, उनकी गुल्ली और अँगूठीको कुएँमेंसे निकालना एवं भीष्मका उन्हें अपने यहाँ सम्मानपूर्वक रखना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 130: द्रोणका द्रुपदसे तिरस्कृत हो हस्तिनापुरमें आना, राजकुमारोंसे उनकी भेंट, उनकी गुल्ली और अँगूठीको कुएँमेंसे निकालना एवं भीष्मका उन्हें अपने यहाँ सम्मानपूर्वक रखना  »  श्लोक 74
 
 
श्लोक  1.130.74 
तां प्रतिज्ञां प्रतिज्ञाय यां कर्तास्म्यचिरादिव।
द्रुपदेनैवमुक्तोऽहं मन्युनाभिपरिप्लुत:॥ ७४॥
 
 
अनुवाद
जाते समय मैंने एक वचन दिया था जिसे मैं शीघ्र ही पूरा करूँगा। द्रुपद द्वारा मेरे प्रति कहे गए तिरस्कारपूर्ण शब्दों के कारण मैं अत्यंत दुःखी हूँ।
 
While leaving I had made a promise which I will fulfill soon. I am extremely upset because of the contemptuous words spoken by Drupada towards me. 74.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)