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mahabharat 1.130.7: इस दुनिया में किसी भी इंसान के दिल में दोस्ती हमेशा के लिए नहीं रहती। वक़्त एक दोस्त को दूसरे से अलग कर देता है या गुस्सा इंसान को दोस्ती से अलग कर देता है। 7.   |   mahabharat अध्याय 1.130: द्रोणका द्रुपदसे तिरस्कृत हो हस्तिनापुरमें आना, राजकुमारोंसे उनकी भेंट, उनकी गुल्ली और अँगूठीको कुएँमेंसे निकालना एवं भीष्मका उन्हें अपने यहाँ सम्मानपूर्वक रखना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 130: द्रोणका द्रुपदसे तिरस्कृत हो हस्तिनापुरमें आना, राजकुमारोंसे उनकी भेंट, उनकी गुल्ली और अँगूठीको कुएँमेंसे निकालना एवं भीष्मका उन्हें अपने यहाँ सम्मानपूर्वक रखना  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  1.130.7 
न सख्यमजरं लोके हृदि तिष्ठति कस्यचित्।
कालो ह्येनं विहरति क्रोधो वैनं हरत्युत॥ ७॥
 
 
अनुवाद
इस दुनिया में किसी भी इंसान के दिल में दोस्ती हमेशा के लिए नहीं रहती। वक़्त एक दोस्त को दूसरे से अलग कर देता है या गुस्सा इंसान को दोस्ती से अलग कर देता है। 7.
 
Friendship does not remain forever in the heart of any human being in this world. Time separates one friend from another or anger separates a person from friendship. 7.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)