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mahabharat 1.130.69-72: 'हे श्रेष्ठ ब्राह्मण! तुम्हारे साथ मेरी पूर्व मैत्री (साथ-साथ खेलने और पढ़ने की) स्वार्थपूर्ण थी। सत्य तो यह है कि दरिद्र धनवान का, मूर्ख विद्वान का और कायर वीर का मित्र नहीं हो सकता; अतः तुम पूर्व मैत्री पर कैसे विश्वास करते हो? हे मूर्ख! क्या बड़े-बड़े राजा तुम्हारे समान दरिद्र और दरिद्र लोगों के साथ कभी मित्रता कर सकते हैं? जो श्रोत्रिय नहीं है, वह श्रोत्रिय का मित्र नहीं हो सकता; जो सारथी नहीं है, वह सारथी का मित्र नहीं हो सकता और जो राजा नहीं है, वह राजा का मित्र नहीं हो सकता। फिर तुम मुझे पुरानी मैत्री की याद क्यों दिलाते हो? मुझे तो कुछ भी स्मरण नहीं है कि मैंने तुम्हें अपने राज्य के बदले क्या वचन दिया था।   |   mahabharat अध्याय 1.130: द्रोणका द्रुपदसे तिरस्कृत हो हस्तिनापुरमें आना, राजकुमारोंसे उनकी भेंट, उनकी गुल्ली और अँगूठीको कुएँमेंसे निकालना एवं भीष्मका उन्हें अपने यहाँ सम्मानपूर्वक रखना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 130: द्रोणका द्रुपदसे तिरस्कृत हो हस्तिनापुरमें आना, राजकुमारोंसे उनकी भेंट, उनकी गुल्ली और अँगूठीको कुएँमेंसे निकालना एवं भीष्मका उन्हें अपने यहाँ सम्मानपूर्वक रखना  »  श्लोक 69-72
 
 
श्लोक  1.130.69-72 
आसीत् सख्यं द्विजश्रेष्ठ त्वया मेऽर्थनिबन्धनम्।
न ह्यनाढॺ: सखाढॺस्य नाविद्वान् विदुष: सखा॥ ६९॥
न शूरस्य सखा क्लीब: सखिपूर्वं किमिष्यते।
न हि राज्ञामुदीर्णानामेवम्भूतैर्नरै: क्वचित्॥ ७०॥
सख्यं भवति मन्दात्मन् श्रियाहीनैर्धनच्युतै:।
नाश्रोत्रिय: श्रोत्रियस्य नारथी रथिन: सखा॥ ७१॥
नाराजा पार्थिवस्यापि सखिपूर्वं किमिष्यते।
अहं त्वया न जानामि राज्यार्थे संविदं कृताम्॥ ७२॥
 
 
अनुवाद
'हे श्रेष्ठ ब्राह्मण! तुम्हारे साथ मेरी पूर्व मैत्री (साथ-साथ खेलने और पढ़ने की) स्वार्थपूर्ण थी। सत्य तो यह है कि दरिद्र धनवान का, मूर्ख विद्वान का और कायर वीर का मित्र नहीं हो सकता; अतः तुम पूर्व मैत्री पर कैसे विश्वास करते हो? हे मूर्ख! क्या बड़े-बड़े राजा तुम्हारे समान दरिद्र और दरिद्र लोगों के साथ कभी मित्रता कर सकते हैं? जो श्रोत्रिय नहीं है, वह श्रोत्रिय का मित्र नहीं हो सकता; जो सारथी नहीं है, वह सारथी का मित्र नहीं हो सकता और जो राजा नहीं है, वह राजा का मित्र नहीं हो सकता। फिर तुम मुझे पुरानी मैत्री की याद क्यों दिलाते हो? मुझे तो कुछ भी स्मरण नहीं है कि मैंने तुम्हें अपने राज्य के बदले क्या वचन दिया था।
 
'O great Brahmin! My friendship with you earlier (playing and studying together) was based on selfish motives. The truth is that a poor man cannot be a friend of a rich man, a fool of a learned man and a coward of a brave man; therefore, how do you trust the earlier friendship? O fool! Can great kings ever be friends with poor and poor people like you? One who is not a Shrotriya cannot be a friend of a Shrotriya; one who is not a charioteer cannot be a friend of a charioteer and one who is not a king cannot be a friend of a king. Then why do you remind me of the old friendship? I do not remember anything that I had promised you for my kingdom.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)