श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 130: द्रोणका द्रुपदसे तिरस्कृत हो हस्तिनापुरमें आना, राजकुमारोंसे उनकी भेंट, उनकी गुल्ली और अँगूठीको कुएँमेंसे निकालना एवं भीष्मका उन्हें अपने यहाँ सम्मानपूर्वक रखना  »  श्लोक 64
 
 
श्लोक  1.130.64 
स मां निराकारमिव प्रहसन्निदमब्रवीत्।
अकृतेयं तव प्रज्ञा ब्रह्मन् नातिसमञ्जसा॥ ६४॥
 
 
अनुवाद
परन्तु द्रुपद ने मुझे नीच समझकर मेरा उपहास किया और इस प्रकार कहा - 'ब्राह्मण! तुम्हारी बुद्धि अत्यन्त चंचल और अशुद्ध है।'
 
But Drupada, considering me to be a lowly person, ridiculed me and said thus - 'Brahmin! Your intellect is extremely inconsistent and impure. 64.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)