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mahabharat 1.130.62-63: उस समय मुझे द्रुपद की मित्रता और उनकी कही हुई बातें बार-बार याद आती रहीं। तत्पश्चात मैं अपने पुराने मित्र द्रुपद के पास गया और बोला, 'हे नरश्रेष्ठ! कृपया मुझे, अपने मित्र को पहचानिए।' द्रुपद के पास पहुँचकर मैं उनसे मित्र की तरह मिला।   |   mahabharat अध्याय 1.130: द्रोणका द्रुपदसे तिरस्कृत हो हस्तिनापुरमें आना, राजकुमारोंसे उनकी भेंट, उनकी गुल्ली और अँगूठीको कुएँमेंसे निकालना एवं भीष्मका उन्हें अपने यहाँ सम्मानपूर्वक रखना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 130: द्रोणका द्रुपदसे तिरस्कृत हो हस्तिनापुरमें आना, राजकुमारोंसे उनकी भेंट, उनकी गुल्ली और अँगूठीको कुएँमेंसे निकालना एवं भीष्मका उन्हें अपने यहाँ सम्मानपूर्वक रखना  »  श्लोक 62-63
 
 
श्लोक  1.130.62-63 
संस्मरन् संगमं चैव वचनं चैव तस्य तत्।
ततो द्रुपदमागम्य सखिपूर्वमहं प्रभो॥ ६२॥
अब्रुवं पुरुषव्याघ्र सखायं विद्धि मामिति।
उपस्थितस्तु द्रुपदं सखिवच्चास्मि संगत:॥ ६३॥
 
 
अनुवाद
उस समय मुझे द्रुपद की मित्रता और उनकी कही हुई बातें बार-बार याद आती रहीं। तत्पश्चात मैं अपने पुराने मित्र द्रुपद के पास गया और बोला, 'हे नरश्रेष्ठ! कृपया मुझे, अपने मित्र को पहचानिए।' द्रुपद के पास पहुँचकर मैं उनसे मित्र की तरह मिला।
 
At that time I kept remembering Drupada's friendship and the things he had said. Thereafter, I went to my old friend Drupada and said, 'O best of men! Please recognize me, your friend.' On reaching Drupada, I met him like a friend.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)