पिष्टोदकं सुतो यस्य पीत्वा क्षीरस्य तृष्णया।
नृत्यति स्म मुदाविष्ट: क्षीरं पीतं मयाप्युत॥ ५७॥
इति सम्भाषतां वाचं श्रुत्वा मे बुद्धिरच्यवत्।
आत्मानं चात्मना गर्हन् मनसेदं व्यचिन्तयम्॥ ५८॥
अपि चाहं पुरा विप्र्रैर्वर्जितो गर्हितो वसे।
परोपसेवां पापिष्ठां न च कुर्यां धनेप्सया॥ ५९॥
अनुवाद
जिसका पुत्र आटे से मिला हुआ जल पीकर दूध की इच्छा से प्रसन्न होकर नाच रहा है और कह रहा है कि 'मैंने भी दूध पी लिया है।' जब मैंने ऐसे लोगों की बातें सुनीं, तो मेरा मन स्थिर न रहा। मैं स्वयं ही मन में अपनी निन्दा करते हुए सोचने लगा - 'मुझे दरिद्र जानकर ब्राह्मणों ने मुझे पहले ही त्याग दिया है। धन के अभाव से निन्दा होने पर मैं व्रत तो कर सकता हूँ, परन्तु धन के लोभ से मैं कभी दूसरों की सेवा नहीं कर सकता, जो कि अत्यन्त पापमय कर्म है।'॥57-59॥
'Whose son, after drinking water mixed with flour, is dancing in joy saying, "I have also drunk milk" due to the desire for milk. When I heard the voices of such people talking, my mind could not remain stable. I myself started thinking in my mind, criticizing myself - 'Knowing me to be poor, the Brahmins have already left me. I may fast after being criticized due to lack of money, but I can never serve others out of greed for money, which is a very sinful act.'॥ 57-59॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)